आखिरी मुलाकात- Heart wrenching story in hindi

आखिरी मुलाकात । आज शनिवार था इसलिए मुझे ऑफिस में कुछ ज्यादा काम नहीं था । मैं बार बार घड़ी के और देख रहा था । कब ६ बजेंगे और मुझे छुट्टी मिलेगी! जैसे हो ऑफिस छूटा मैं बाइक लेकर मेरे रूम में जाने को निकला । मैंने हेयडफोन्स निकाले और FM गाने सुनने लगा ।

मेरा पसंदीदा गाना लगा था आखिरी मुलाकात !

मेरा नाम हर्षल । मैं वैसे तो एक छोटे से गाव संगमनेर का हूँ लेकिन नोकरी के वजह से पुणे में सेटल हुआ हूँ । मेरे माँ बाप तो गाव में ही रहते है । मैं मेरे गर्लफ्रेंड के साथ स्वारगेट में १ BHK फ्लॅट में रहता हूँ ।

वैशाली और में २ साल से साथ रहते है और हमारा इस साल शादी करने का भी इरादा है हमारे घरवाले भी मान गए है । हमारे प्यार की शुरुवात बड़े ही अजब तरीके से हुई थी । वो मैं तुम्हें किसी और दिन बताऊँगा ।

आज तो बारिश का मौसम था । मेरा मूड भी अच्छा था । मैंने ऑफिस के बाहर आते ही वैशाली को कॉल लगाया । रात को मूवी देखने का प्लान बनाया वो भी राजी हो गयी ।

लेट नाइट शो था इसीलिए कुछ ज्यादा जल्दी नहीं थी ।

मैंने बाइक निकाली कात्रज चौक में रुक गया क्योंकि कात्रज में होटल शिवराज में  बहुत ही अच्छे भजिया और वडा पाव मिलता है । वैशाली को भजिया बहुत पसंद है तो मैंने वहाँ से पार्सल लेने का डिसाइड किया ।

मैं मुझे भूक भी लगी थी तो मैंने वही पर एक प्लेट वडा पाव मँगवाया ।होटल मे भी FM का गाना बज रहा था आखिरी मुलाकात ! मैं वडापाव खाने ही वाला था तभी एक १४ साल के लड़के ने मेरा हाथ पकड़ा ।  मैंने देखा एक दुबला पतला सा  लड़का, फटे हुए कपड़े वो भी मैले हुए, शायद बहुत दिनों से नहाया नहीं होगा या फिर पहने के  लिए कपड़े ही नहीं होंगे  ।

मुझे बोलने लगा ।

“भैय्या मुझे बहुत भूख लागि है क्या आप मुझे २० रुपये दे सकते है?”
    मुझे उस पर दया आयी । मैंने उसे पूछा ।

“तुम भजी खाओगे?”
“नहीं भैय्या, सिर्फ २० रुपये दे दो, भजी खाकर मेरे बहन को पेट में दर्द होता है”
  मैंने थोड़ी देर सोचा ।

“२० रुपये से क्या होता है? ये लो”
   मैंने उसके हाथ में १०० रुपये का नोट रखा । जैसे ही उसने वो १०० का नोट देखा बहुत खुश हो गया ।

उसके आँखों में आँसू आ गए । मैंने उससे पूछा ।

“क्या हुआ क्यों रो रहे हो?”
“कुछ नहीं भैय्या, १५ दिन से पेट भर के खाया नहीं था । आज आपकी वजह से पेट भर के खाना मिलेगा”
   उसने अपने आँखों के आँसू पोंछे ।

“आपका बहुत बहुत शुक्रिया”
 “अरे ऐसा मत कहो, तुम और तुम्हारी बहन पेट भर के खाना खाओ”

   वो बाहर गया और अपने बहन को होटल में लेकर आया । मेरा ध्यान उसि के तरफ था ।

उन्होंने पेट भर के खाना खाया । वहाँ से जब वो दोनों जाने लगे मैं उनको रोक कर पूछा ।

“ठेहरो, मेरी तरफ से चाय पीके जाओ,”

  वो दोनों मेरे ही टेबल के सामने आकार बैठ गए । मैंने उस लड़के से पूछा । 

“तुम्हारा नाम क्या है? और कहा से आये हो?”
   उसने फिर अपने बहन के कान में कुछ कहा वो दूसरे टेबल पर जाके बैठ गई ।

और फिर वो लड़का अपनी कहानी बताने लग गया ।

“मेरा नाम रोहन है, मेरा परिवार सातारा के वाई गाव में रहता ठा । मेरे परिवार में पापा, मम्मी और मैं ही थे । मेरे बड़े चाचा और उनका परिवार भी पड़ोस में रहता था ।मेरी दादी चाचा के घर ही रहती थी ।  एक दिन मम्मी ने मुझे कहा की हमारे घर में एक नन्हा स मेहमान आने वाला है, मैं तो खुशी से नाचने लगा क्योंकि मेरे साथ खेलने के लिए एक छोटा बेबी आने वाला था, सब खुशी से चल रहा था लेकिन कुछ महीने बाद पापा को उनके  बिजनस में भारी नुकसान हो गया, और उस दिन से वो हर रोज दारू पीने लगे, मम्मी को पीटने लगे, घर का वातावरण बेहद खराब हो गया था । ऐसे ही में एक दिन पापा देर रात दारू पीके आए और मम्मी  को मारने लगे,  मम्मी को ९ वा महना चालू था । उनके मार के वजह से मम्मी बेहोश हो गयी । मैं जोर से चिल्लाया तब पड़ोस के चाचा भागकर हमारे घर आगए । तब तक पापा भाग चुके थे । चाचा मम्मी को अस्पताल लेके गए । डॉक्टर ने मम्मी को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे वो बचा नहीं पाए लेकिन भगवान की मेहरबानी की डॉक्टर ने हमारे छोटी बच्चि को बचा लिया । पापा को पुलिस ले गए और हमारे घर को बैंक ने सीज कर दिया क्योंकि पापा ने बैंक से कर्ज लेके रखा था ।

 मैं और सुजाता चाचा के घर में शिफ्ट हो गए । मेरे दादी ने हमे बड़े प्यार से संभाला ।

लेकिन हमारे वजह से चाचा का घर खर्चा बढ़ गया था । इस वजह से दादी में और चाचा में हर दिन बहस रहती थी ।

मुझे सब मालूम था लेकिन मैं मजबूर था और दादी को दादा जी की पेंशन मिलती थी इसीलिए चाचा चुप हो जाते ।

मेरे माँ को गुजरे ८ साल हो गए थे मैं सुबह स्कूल जाता और शाम को चाचा को उनके गॅरेज में मदद करता । मैं बहुर थक जाता लेकिन खुदके लिए और बहन सुजाता के लिए मुझे ये सब करना पड़ता ।चाचा  मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करते  लेकिन दादी मुझ पर बहुत स्नेह रखती थी मुझे खाना खिलाती, मेरे बहन का सब खयाल वो ही रखती थी ।

ऐसे ही एक दिन सुबह मैं दादी को नींद से जगाने गया । वैसे तो वो सबसे पहले उठती थी लेकिन आज क्या मालूम वो उठ ही नहीं रही थी । चाचा ने भी उठाने की कोशिश की लेकिन कुछ असर नहीं हुआ । हम दादी को अस्पताल लेके गए तब पता चला की दादी तो जा चुकी है तभी मैं  फिर से एक बार अनाथ हो गया ।

दादी को गुजरे एक महीना भी नहीं हुआ था तो चाचा मुझसे बोले ।

“बहुत दिन हो गए हम कही घूमने नहीं गए, आज हम कई बाहर जाते है”
  मेरी तो इच्छा नहीं थी लेकिन चाचा के सामने मेरी एक  न चलती तो मैं, सुजाता और चाचा जी बस से पुणे  आ गए ।       

    चाचा ने मेरे हाथ में १०० रुपये रखे और कहा

“तुम दोनों यही रुकना मैं बाथरूम जाकर आता हूँ”

२ घनरते होगए लेकिन चाचा वापस नहीं आया तो मैं उनको ढूँढने लगा । लेकिन वो कही नहीं मिला ।

मैं समझ गया की चाचा ने जान बूझकर हमे यह लाके छोड़ दिया है ।

उस रात हम बस स्टैन्ड पर ही सो गए ।

उस दिन से हम ऐसे ही भटकते रहते है । कोई न कोई आके हमे पैसे दे ही जाता है

आज आप भगवान बनकर आए”
   
मैं ये सब सुन रहा था । मेरे आखें नम हो गयी थी ।

मैंने अपने पॉकेट में देखा  सिर्फ ५०० रुपये बचे थे । वो ५०० रुपये उसके हाथ में देकर मैंने उससे पूछा ।

“तुम कहा रहते हो”

 उसने कहा

“पास वाले झोपड़ी में रहते है”

“ठीक है, फिर मिलते है मैँ कल आऊँगा तुमसे मिलने”
उनसे हाथ जोड़े ।

मैंने अपनी बाइक निकाली और अपने फ्लॅट में पहुचा ।

वैशाली मेरी ही राह देख रही थी ।

“कहा थे इतनी देर?”
 मैंने उसे रोहन की सारी कहानी बात दी । वो तो रोहन की कहानी सुनकफ़ ही रोने लगी ।

मुझे बोली तुम उन दोनों को लेकर क्यों नहीं आए?
सवाल सही था मुझे उन दोनों को यहाँ लेकर आना चाहिए था लेकिन मेरे दिमाग से यह बात कैसे निकल गयी क्या मालूम?

रात के ९ बजे थे, हमने मूवी जाने क प्लान कैन्सल कर दिया । बाहर जोर से बारिश हो रही थी ।

मैंने वैशाली से कहा मैं कल सुबह जाता हूँ और उनको यहाँ लेके आता हूँ ।

फिर बिना खाना खाए ही हम सो गए ।

सुबह ९ बजे जब मैं कात्रज  चौक पहुचा मैंने देखा की वो होटल तो बंद है मैंने पूछताछ की तब तब पता चला की होटल के मालिक शनकर दादा कल रात को ही अपने गाव किसी काम से गए है ।

तब मैंने आस पास के स्लम एरिया में रोहन को ढूंढा लेकिन वो और उसकी बहन सुजाता कही नहीं मिले । मैं निराश होकर घर चला गया ।

अगले दिन सोमवार था तो उन्हे ढूँढना मुमकिन नहीं था ।

ऐसे ही पूरा हफ्ता बीत गया ।

शनिवार के दिन काम करते करते रात के ९ कब बजे गए पता नहीं चला । बाकी का काम सोमवार को करेंगे ऐसा सोचकर मैं वहाँ से निकला ।

मैं बाइक से घर जा रहा था । तभी कॉर्नर पे मुझे वो दोनों भाई बहन दिख गए । मैंने गाड़ी स्टैन्ड पर लगाई । रोहन को पूछा ।

“अरे भाई कहा थे इतने दिन मैंने तुमको कितना ढूंढा पता है तुम्हें?”
“भैय्या आपने हमारे लिए बहुत कुछ किया है लेकिन अब हमे हमारा घर मिल गया”
“कहा पर”
“यही रास्ते के उस साइड जो कच्चा रास्ता है न वही पर”
     मुझे अच्छा लगा । उनके रहने का इंतेजाम तो हो गया था लेकिन खाने का क्या?”
मैंने जेब में से २००० रुपये का नोट निकाला उसे देने लगा । तभी वो पीछे हटा ।

“नहीं भैय्या, अब इसकी हमे जरूरत नहीं,हम तो सिर्फ आपको मिलने आए थे”
“ठीक है मिलते है फिर”

“नहीं भैय्या ये हमारी आखिरी मुलाकात है”
 इतना कह कर वो वहाँ से चला गया ।

उसने ऐसा क्यूँ कहा की यह हमारी आखिरी मुलाकात है?

दूसरे दिन मैं वैशाली को लेकर होटल शिवराज पहुचा ।

वैशाली को उन बच्चों से मिलना था ।  हम होटल गए होटल के मालिक शंकर  दादा से रोहन और सुजाता के बारे में पूछा । शंकर दादा ने मुझे देखते ही पहचान लिया क्योंकि जब मैं रोहन को पैसे दे रहा था शंकर दादा वही थे ।

शंकर दादा कहने लगे । उन बच्चों के साथ बहुत बुरा हुआ ।

मैंने पूछा क्या हुआ ?

उन्होंने अपने एक वेटर को बुलाया जो वही रहता था ।

“साब जब आप उन बच्चों को मदद कर के चले गए, उस रात वो पास वाली झोपड़ी में सोये हुए थे । बारिश बहुत थी । इसीलिए वो झोपड़ी से उठकर वो बाजू वाले कॉर्नर पर चले गए,  वहाँ सोसाइटी का वॉचम्न दारू के नशे में धुत था । उसने रोहन के जेब में ५०० रुपये देख लिए, और फिर उसने पास का एक पत्थर उठाकर रोहन के सर पर जोर से मारा । रोहन वही पर मर गया । उस नीच वॉचमन ने उसकी जेबसे पैसे उठा लिए और…..

      और उस बेचारी १० साल की लड़की के साथ बलात्कार किया और फिर उसे भी मार डाला । बारिश बहुत तेज थी और रात भी ठही इसीलिए हमे कुछ नहीं पता लगा । जब सुबह हुई तब cctv  से सारा मामला समझ आया । पुलिस सुबह आकर उस वॉचमन को पकड़कर ले गयी । तीन दिन बाद जब शंकर दादा आए तब हमनें उनको सब बता दिया ।

  ये सुनते ही मानो मेरे नीचे के जमीन फट गयी हो । मैं वही पर रोने लगा । शंकर दादा ने मुझे पानी दिया । वैशाली मुझे समझा रही थी ।

मैंने उससे कहा ।

“उसी रात अगर मैं उन दोनों को घर ले आता तो आज ये सब न हुआ होता!”

  शंकर दादा ने मेरे  कंधे पर हाथ रखा ।

“हर्षल जी, कुछ चीजे हमारी हाथ में नहीं होती, यह आपकी उनके साथ आखिरी मुलाकात थी ! आप घर जाओ आराम करो खुद को संभालो”
   वैशाली और मैं वह से निकल आए ।

दूसरे दिन मुझे तेज बुखार था इसीलिए ऑफिस से छुट्टी ले ली ।

लेकिन बार बार मेरे मन में खयाल आ रहा था ।

जब उनकी हत्या हुए ६ दिन बीत चुके थे टू परसों रात को मुझे कैसे मिले?
शायद उन्हे एक आखिरी बार मुझसे मुलाकात करनी थी । शायद इस आखिरी मुलाकात में उन्हे बताना था की

भैय्या अब हमारी चिंता मत करो, हमारे सारे दुख और दर्द से अब हमे छुटकारा मिल गया है ।

उनकी वो आखिरी मुलाकात मेरे दिल को जख्म दे कर चली गयी हमेशा के लिए ।

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