वासना- खुशी या अपराध?

the story of lust

अमन एक बड़ी से मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता था । ४० साल की उम्र में उसने वो सब पा लिया था जिसकी एक आम आदमी सिर्फ कल्पना कर सकता है । हरसाल फ़ॉरेन ट्रिप, फाइव स्टार होटल में स्टे, साल में दो बार वैकैशन, ये सब था उसके पास । घर में सुंदर और समझदार बीवी, २ बच्चे जो अभी कॉलेज जाने लगे थे । अमन देखने में भी हैंड्सम था, जिम जाता था इसीलिए बॉडी भी अच्छी मैन्टैन थी । उसकी बीवी भी बहुत पढ़ी लिखी थी । एक आदमी को और क्या चाहिए ? लेकिन इतना सब होते हुए भी अमन खुश नहीं था । क्योंकि उसमे वासना की लत थी ।

उसकी बीवी सीमा  अब इस संसार से ऊब चुकी थी । वो  परमार्थ चिंतन और आध्यात्मिकता में अधिक रुचि लेने लग गई थी ।  सिर्फ खुशिया पाने को ज़िंदगी नहीं कहते । वो अंदरूनी शांति के शोध में थी । लेकिन अमन इस बात से बिल्कुल खुश नहीं था । मानव का जन्म सिर्फ और सिर्फ जीने के लिए हुआ है ऐसा उसका मानना था । लेकिन उसकी बीवी उसे अब चुने तक नहीं देती थी ।

कई दिनों से वो अपने  बच्चों के साथ ही सोती ।  अमन इस बात से चिढ़ गया था । लेकिन वो कुछ नहीं कर नहीं सकता था ।

एक दिन ऑफिस के पार्टी में महंगी वाली स्कॉच पीते पीते उसका ये दुख उभर आया । ४ पेग अंदर जाते ही मन की भड़ास बाहर निकलने लगी । अंदर की वासना बाहर उमेड़ने लगी ।

“अरे यार सभी बीविया ऐसे ही होती है”
   उसका मार्केटिंग हेड दुबे उसे समझा रहा था ।

“बीवी को भूल जाओ अभी, किसी और जगह अपना खाता खुलवाओ”

     आँख मारकर दुबे ने उसे सलाह दी । 

   यह सूँतेही उसकी आंखे चमक उठी ।

सच में ! मैंने ऐसा कभी सोचा ही नहीं,

अमन जैसे जैसे इसके बारे में सोचने लगा वैसे वैसे उसका दिमाग भारी होने लगा ।

ऑफिस में कई सारी लड़किया थी जवान थी, खूबसूरत थी लेकिन उनको अप्रोच करने में बहुत खतरा था । अगर कोई इशू हो जाता तो नोकरी छोड़नी पडतो वो अलग लेकिन बदनामी भी बहुत होती ।

“ऑफिस में कोई लफड़ा मत करना”
    मानो दुबे उसकि मन की बात सुन रहा था ।

“फिर क्या करू? इस वासना को कैसे शांत करू?”
“इतना उदास मत हो, मैं तुम्हें एक जबरदस्त idea देता हूँ”
  दुबे ने उसके कान में कुछ कहा । वो सुनतेही अमन खुश हो गया  ।

दूसरे दिन ऑफिस को छुट्टी थी ।

 अमन हॉल में बैठकर अखबार पढ़ रहा था । सीमा ने उसे आवाज लगायी ।

“सुनिए जी, आज मंदिर में एक बड़े बाबा आने वाले है, तो मैनन वहाँ जा रही हूँ, नीलम को बोलना आज के दिन मेरा कहना मत बनाए, और बच्चे कॉलेज से आते ही उन्हे खाना गरम करके देना”
   ऐसा बोलकर सीमा वहाँ से चली गयी । वो जाते ही अमन के मन में लड्डू फूटने लगे । अभी थोड़ी ही देर में नीलम आएगी ।

नीलम उनके घर में काम करती थी । खाना बनाना, घर साफ करना, बर्तन मँझना ये सब काम वो करती थी वैसे तो रंग रूपसे वो सावली थी लेकिन ३० साल की नीलम शरीर से एकदम ऐक्ट्रिस लगती थी ।

कल रात को हुए पार्टी में दुबे ने दिया हुआ गुरुमंत्र उसके कान में गूंजने लगा ।

कामवाली बाई, एकदम सॉफ्ट टारगेट था उसके लिए, इसमे कोई खतरा भी नहीं था ।

थोड़ी देर में घर की बेल बजी । अमन ने दरवाजा खोला । नीलम थी ।

वो अंदर आयी और काम पर लग गयी । अमन ने सीमा का संदेश नीलम को बताया ।

नीलम अब कीचन में आटा मूँदने लगी ।

इधर हॉल में बैठकर अमन के दिल में जोर से धक धक हो रही थी । लेकीन उसके अंदर की वासना उसे शांत बैठने नहीं दे रही थी ।

उसको इस बात के लिए कैसे मनाऊ?
वो सोच में पड गया । उसने बेडरूम में जाकर दुबे को कॉल लगाया ।

“अबे उसको इस बात के लिए कैसे राजी करू?”
“पैसा बोलता है अमन, अपने जेब में २००० का नोट रख बिंदास उसके पास जा उसको हिन्ट दे और शुरू हो जा”
 अमन ने फोन रख दिया । रोटी बनाते हुए उसने नीलम को देखा और अमन के जिस्म में तेजी से खून दौंडने लगा ।

उसने अपने ऊपर वाले जेब में २००० का नोट रखा ।

और अब धीरे धीरे किचन की और जाने लगा । । उसकी अंदर की वासना उसे खाए जा रही थी । वो अब आगे का कदम उठाता तभी नीलम का फोन बजा । अमन फिर से वापस लौट आया लेकिन उसकी नजर और कान नीलम पर ही थे ।

“हाँ बोलो दीदी, कुछ काम है क्या”
फोन से कुछ आवजे आयी ।

“नहीं दीदी अभी थोड़ा अच्छा लग रहा है सुबह ही दवाई खा ली थी,”
  फिर से फोन में से कुछ आवाज

“कैसे मुमकिन है दीदी? अभी मैं आराम नहीं कर सकती, डॉक्टर बोल रहे है इलाज  १० हजार लगेंगे इतने पैसे कहा से लाऊ दीदी? इस महीने बेटे के स्कूल की फी भरनी है”

फिर थोड़ी देर बात होने के बात नीलम बोली ।

“चल रखती हूँ, अभी सीमा मैडम के घर में हूँ अभी चार  घर और काम करना है”
   ऐसा बोलकर उसने फोन रख दिया  ।

और अपने दुखते हुए कमर पर एक हाथ रखकर दूसरे हाथ से खाना बनने लगी ।

अमन चुप चाप ये सब सुन रहा था । उसे खुद से घिन आने लगी । खुद की ही उसे शर्म आने लगी । वो फिर से बेडरूम में आया । वॉशरूम जाकर अपना चेहरे पर जोर से पनि मारा । अब वो खुद को आयने में भी देख नहीं पा रहा था । टोल से उसने अपना चेहरा पोंछकर किचन में गया ।

“नीलम”
   हल्के आवाज में उसने आवाज दिया ।

नीलम ने पीछे देखा ।

“ये लो इस महीने का अड्वान्स”
“लेकिन साब इतने जल्दी क्यों”
“अरे ले लो तुम कहा भागी जा रही हो’

उसने चुप चाप पैसे ले लिए ।

“और सुनो ये लो तुम्हारे इलाज के लिए”
   उसने नीलम के हाथ में १० हजार रुपये रख दिए ।

“नहीं साब मैं ये पैसे  नहीं ले सकती”
“मुझे माफ कर दो नीलम मैंने तुम्हारे दीदी के साथ हुई बातचीत सुन ली, मुझे पता है तुम्हें पैसे की जरूरत है”
“नहीं साब,  मैं आपको ये पैसे कब लौटाऊँगी मुझे हो पता ही नहीं”
   वो अब शायद रोने वाली थी ।

“उसकी कोई जरूरत नहीं नीलम जब पैसे आ जाएंगे तब धीरे धीरे करके लौटा देना, और वैसे भी तुम्हारा भाई तुम्हें पैसे दे रहा है तुम्हें ये लेने ही होंगे, और पैसों की जरूरत पड़े तो बताना तुम्हारा भाई अभी है”
  अमन ने फिर जबरदस्ती उसके हाथ में वो १० हजार रुपये रख दिए ।

नीलम अब फुट फुट के रोने लगी ।

अमन ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा लेकिन उस स्पर्श में वासना नहीं थी बल्कि एक भाई का आश्वासन था ।

“मेरे पहचान के एक डॉक्टर है जो तुम्हारा कमर दर्द दूर कर देंगे, और तेरे बेटे जी चिंता मत कर उसे हम पढ़ा लिखाकर बहुत बड़ा आदमी बनाएंगे”
“आपके जैसा?”
    नीलम ने पूछा ।

“नहीं मेरे जैसा नहीं”

और फिर वो चुप चाप कमरे की ओर जाने लगा । सिर्फ खुशिया पाना  ही ज़िंदगी नहीं है बल्कि खुशिया बांटना भी ज़िंदगी है उसे अब समझ आ गया था ।

उसकी वासना अब साफ सुथरे प्रेम में बदल चुकी थी ।

आज उसके अंदर के इंसान ने उसके अंदर के जानवर पर मात कर दी । 

( ऐसे ही सामाजिक कहानी पढे यहा पर )

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