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           राकेश दुबे बाल्कनी में आज का अखबार पढ़ रहे थे । पेपर पढ़ते पढ़ते अपने बीते  हुए कल को याद कर रहे थे । ५  साल पहले उन्हों ने रिटायरमेंट ले ली । रिटायरमेंट के बाद राकेश जी ने बहुत सारे प्लॅन्स किए थे लेकिन २ साल पहले उनकी धर्मपत्नी परलोक सिधार गई । अब अकेलेपन के अलावा कोई और सहारा नहीं था । वैसे तो उनका बेटा  रोहित और बहु कोमल थे घर में साथ में पोता विराज भी था लेकिन बेटे और बहु को नौकरी के वजह से दिन भर ऑफिस में रहना पड़ता और पोता दिन भर स्कूल में । ऐसे में राकेश जी बहुत आत्मकेंद्रित बन गए थे । वो चाहते थे की मैं अपने परिवार का हिस्सा बनू न की उनके लिए बोझ ।

          एक दिन राकेश जी सुबह जल्दी उठकर सोचा की बहु और बेटे के लिए चाय  बना देता हु और उनसे थोड़ी बात भी हो जाएगी । लेकिन हड़बड़ी में चाय बनाते वक्त दूध का पाटील उनके हाथ से छूट गया । सारा दूध जमीन पर गिर गया । पूरा फर्श भी खराब हो गया । बहु नाराज हो गई । उसने कुछ बोल नहीं लेकिन उसके देहबोली से सब पता चल रहा था । उस दिन रोहित ने अपने पिता जी से कह दिया ।

“बाबूजी आप कल से कुछ काम मत करना, हमारा काम निपट जाने के बाद हम खुद आपको आपके रूम में चाय दे देंगे”
                 राकेश जी ने चुपचाप सुन लिया । तब से वो और आत्मकेंद्रित रहने लगे । कुछ दिनों बाद उनका पोता विराज जब स्कूल जा रहा था तब राकेश जी ने कहा।

“चलो आज मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देता हूँ”
      तब उनका पोत बोला ।

“दादाजी, अब मैं बाद हो गया हूँ ! मैं अकेला स्कूल जा सकता हूँ, अगर आप मेरे साथ आए तो मेरे दोस्त हसेंगे मुझ पर”
        इसबार भी राकेश जी ने कुछ नहीं बोला । तब से वो अपने ही रूम में रहने लगे । खाना खाने के लिए और अगर कोई मेहमान आए तब वो रूम से बाहर निकलने लगे । और ज्यादा आत्मकेंद्रित बनना उनके दिमाग के सेहत के लिए ठीक नहीं था । इसिलए उन्होंने तय किया की शाम से पार्क में घूमने जाऊंगा ।

       ऐसे ही एक दिन शाम को घूमकर जब वो लौट रहे थे । राकेश जी ने देखा एक कार के शोरूम में एक पुरानी सी गाड़ी खड़ी है बेहद पुरानी ! । उस गाड़ी को सब से अलग रखा गया था । राकेश जी की जिज्ञासा बढ़ गई । बिना कुछ सोचे वो शोरूम के अंदर चले गए ।

“सर कौन सी  कार लेना चाहेंगे?”
    सैल्समन ने बड़े विनम्रता से पूछा ।

“गाड़ी लेने के लिए नहीं बल्कि इस गाड़ी के बारे में पूछने आया हूँ”
     राकेश जी ने उस गाड़ी की तरफ इशारा करते हुए बोला ।

“सर यह विंटेज कार है, १९६० में अयोध्या के नवाब साहब ने खरीदी थी”
“इसपर कीमत का टैग क्यों नहीं है ?”
   राकेश जी दिमाग से प्रश्न थम नहीं रहे थे ।

“सर यह विंटेज कार है इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती याने की यह कार महंगी नहीं बल्कि बेहद मौल्यवान है”

              राकेश जी विचारों का तूफान लेकर शोरूम से बाहर आए । कुछ दिन बीत गए । दीवाली की छुट्टियों के वजह से सब लोग घर पर ही थे ।  राकेश जी अपने पोते विराज के साथ खेल रहे थे । खेलते खेलते उनका पोता बोला ।

“दादा जी कल पता है क्या हुआ?  हमारे स्कूल के सामने एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ है  । रोड बनाने के चक्कर में कान्ट्रैक्टर उसे गिरने वाले थे, लेकिन कुछ लोग मोर्चा लेकर आए, बोल रहे थे ये पेड़ हम गिरने नहीं देंगे  ! काफी बहस के बाद कान्ट्रैक्टर को अपना फैसला बदलना पड़ा, हमारे टीचर कह रहे थे की पुराना हो या तब भी वो २४ घंटे आक्सिजन देता है इसीलिए उसका महत्व अधिक है”
            राकेश जी विचार मंथन करने लगे । उस दिन जब वो शोरूम से बाहर निकाल रहे थे ठीक वैसा ही उनको आज महसूस हो रहा था ।  पूजा का समय हो गया तभी बहुरानी बोली

“बाबूजी, आज के दिन आप पूजा करोगे?, इतने साल से माँ जी पूजा करती थी, तो सोच आज आपने पूजा की तो अच्छा रहेगा”
       राकेश जी भी तैयार हो गए।  बहु कोमल बहुत अच्छे से तैयारी की थी । खाने के लिए कोमल ने पुराने तांबे के बर्तन निकले उन्हे अकगगई तरह से साफ किया । राकेश जी बोले ।

“बेटी, ये पुराने बर्तन क्यों निकाले?”
“ये स्पेशल बर्तन है बाबूजी, हमारे शादी के दिन माँ जी ने हमे ये बर्तन शगुन के तौर पर दिए थे, माँ जी  तो आज नहीं है लेकिन उनकी यादें तो है”
   यह कहते वक्त कोमाल भावविवश हो गई ।  

        राकेश जी को अब समझ आ गया था । वह पीपल का पेड़, वह  विंटेज कार क्या कहना चाहते थे ! वो समझ गए थे की मैं अब बुड्ढा जरूर हो गया हूँ लेकिन आज भी उनके परिवार का एक अटूट हिस्सा हूँ । मौल्यवान हूँ ।

     उस दिन से राकेश जी एकदम निश्चिंत हो गए । उनको पता था वो अब विंटेज कार है । एकदम स्पेशल !!!

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