ekalvya story
महाभारत दुनिया सबसे पुरातन और सबसे बड़ा ग्रंथ है । निषाधराज के बेटे एकलव्य की महान गाथा से आज हम आपको अवगत करायेंगे ।

एकलव्य का गाव था सिंगारपुर । यह गाव प्रयागराज/ अलाहाबाद से ४० किलोमीटर दूर गंगा नदी के किनारे पर स्थित है । यह गाव को हजारों वर्षों का इतिहास प्राप्त है । यहाँ तक रामायण में भी सिंगारपुर की तथा वहाँ के निषाधराजाओ का वर्णन किया गया है । महाभारत में यह एक समृद्ध शहर था । वहाँ के राज्य थे हिरण्यधनु और उनकी पत्नी का नाम था सुलेखा । एकलव्य इन्ही के एकलौते संतान थे ।
गंगा नदी के किनारों में बसे जंगल में निषाधराज हिरण्यधनु का राज था । वह मगध के सम्राट जरासंध के मांडलिक थे तथा उनके मित्र भी थे । एकलव्य का असली नाम अभीद्ध्यूम्न था । लेकिन अपने जिद्दी स्वभाव के कारण उसे एकलव्य कहा गया । इसी जिद्दी स्वभाव के चलते एकलव्य न ठान लिया की उसे दुनिया का सर्वश्रेष्ट धनुर्धर बनना है । उसे यह उपलब्धि हासिल करने के लिए एक समर्थ गुरु की आवश्यकता थी ।
story of ekalavya and dronacharya
महाभारत काल में धनुर्विद्या का मतलब सिर्फ तीर चलाना नहीं होता था । धनुर्विद्या में कई सारे शास्त्र शामिल थे जिनमे से विष शास्त्र, रसायन शास्त्र, विस्फोटकों का ज्ञान आदि का समावेश था । धनुर्विद्या काफी महत्वपूर्व विद्या थी इसीलिए इसका ज्ञान बिल्कुल गुप्त रखा जाता था ताकि इसका गलत उपयोग न किया जाए । यह अनूठी विद्या सीखने के लिए भगवान परशुराम और गुरु द्रोणाचार्य के अलावा कोई और समर्थ गुरु नहीं था । लेकिन भगवान परशुराम के पास से विद्या सीखना असंभव था इसीलिए एकलव्य सिंगारपुर से गुरुग्राम आया जहाँ पर गुरु द्रोण का आश्रम था ।
एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखने के लिए प्रार्थना की । लेकिन उस वक्त गुरु द्रोण सिर्फ कुरु वंश के राज कुमारों को शिक्षा देते थे । वह अब हस्तिनापुर के अधीन थे । इसीलिए उन्होंने एकलव्य को धनुर्विद्या शिक्षा देने से इनकार कर दिया । द्रोणाचार्य की इनकार से एकलव्य दुखी हुआ लेकिन उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी । किसी भी हालात में दुनिया का सर्वश्रेष्ट धनुर्धर बनने की उसने ठान ली । अपने गाव सिंगारपुर जाने की बजाय एकलव्य ने वही गुरुग्राम के पास में जंगल में अपना बसेरा बसा लिया ।
वह हररोज छिपकर चोरी से द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या सीखते हुए देखता और अभ्यास करता । अपने झोपड़ी के सामने उसने गुरु द्रोण का मिट्टी का पुतला भी बना डाला । ऐसा कहते है की जहा जहा पर गुरु द्रोण के पैरों की निशान पड़े थे वह से मिट्टी इकट्ठा कर के एकलव्य ने पुतला बनाया था । उसी पुतले को अपना गुरु मानकर वह कड़ी एकाग्रता के साथ अभ्यास करता था । इसी में कई सारे साल गुजर गए ।

एक दिन गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ जंगल में सहर करने निकले । उनके साथ उनका पालतू कुत्ता भी था ।
एकलव्य को देखकर वह कुत्ता जोर जोर से भोंकने लगा । एकलव्य की साधना ने व्यत्यय आने लगा । इसीलिए एकलव्य ने उस कुत्ते की ओर कुछ इस तरह से बाण चलाए की वह तीर कुत्ते की मुँह में घुस गए लेकिन उस कुत्ते के जरा स भी जख्म नहीं हुई । उसका भोंकना केवल बंद हो गया ।

यह अनूठी धनुर्विद्या देखकर सभी लोग हैरान रह गए । गुरु द्रोणाचार्य को आते देख एकलव्य ने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया । गुरु द्रोणाचार्य ने जब उनका मिट्टी का पुतला देखा तो वह सोच में पड़ गए । गुरु द्रोण ने उससे पूछा ।
“तुमने इतनी महान विद्या कहा से सीखी और तुम्हारा गुरु कौन है ?”
एकलव्य ने बड़े आदरपूर्वक उत्तर दिया ।
“आप ही मेरे गुरु हो”
और उसने गुरु द्रोण को सारी हकीकत बात दी ।
तब गुरु द्रोण ने काफी सोच विचार कर के एकलव्य से उसके दायें हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा के तौर पे मांग लिया । इस गुरुदक्षिणा के गुरु द्रोण की अपनी खुद की तीन वजह थी ।
पहली वजह यह थी की गुरु द्रोण ने अर्जुन को सर्वश्रेष्ट धनुर्धर बनाने का निश्चय किया था । दुसरी वजह थी एकलव्य ने चोरी से बिना अनुमति के विद्या ग्रहण की थी । जो की उस समय बहुत बड़ा अपराध था परिणाम स्वरूप उसे यह दंड मिला ।
तीसरी वजह राजनैतिक थी । उस समय हस्तिनापुर और मगध एक दूसरे के शत्रु थे । एकलव्य के पिता निषाधराज हिरण्यधनु स्वयं मगध के सम्राट जरासंध के मित्र थे । यदि एकलव्य अच्छा धनुर्धर बनता है तो उससे अपने हस्तिनापुर को बड़ी हानि हो सकती है यह सोच कर गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसका दायें हाथ का अंगूठा मांग लिया । जिगरबाज एकलव्य ने बिना किसी संदेह के अपना अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया । उसकी इस असीम गुरुभक्ति देखकर गुरु द्रोण बेहद प्रसन्न हुए । परिणाम वक्ष उन्होंने एकलव्य को काफी आशीर्वाद भी दिए ।

अंगूठा जाने के बाद भी एकलव्य स्वस्थ नहीं बैठा । उसने धनुर्विद्या का अभ्यास जारी रखा और बिना अंगूठे के ही इसमे निपुणता हासिल कर ली । सिंगारपुर वापस जाकर उसने यह विद्या अपने लोगों को सिखाई । अपने पिता के मृत्यु के बाद एकलव्य निषाध राज बन गया । उसका विवाह दूसरे निषधों के राजा के बेटी सुनीता के साथ हुआ । उनको केतुमान नाम का पुत्र भी प्राप्त हुआ ।
Death of Ekalvya
एकलव्य की मृत्यु
एकलव्य मगध सम्राट जरासंध का बहुत करीबी मित्र था । जब कुंतीपुत्र भीम ने जरासंध का वध किया तब एकलव्य अत्यंत क्रोध आया । उसे पता चला के जरासंध के वध के पीछे श्री कृष्ण का हाथ है तो उसने द्वारका नगरी पर आक्रमण कर दिया उसका हमला इतना शक्तिशाली था की यादवों की सेना को बहुत हानि पहुंची । श्री कृष्ण के बेटे साम तो एकलव्य के हाथ से मरते मरते बचा । इस युद्ध में भगवान श्री कृष्ण और एकलव्य का आमना सामना हुआ और भगवान श्री कृष्ण ने एकलव्य के सिर पर वार कर के एकलव्य का प्राण हरण किए ।

एकलव्य का पुत्र केतुमान महाभारत में कौरव के पक्ष में लड़ा । युद्ध के १४ वे दिन भीम के हाथों केतुमान मारा गया । जहा एकलव्य ने गुरु द्रोण को गुरु दक्षिणा समर्पित की थी उसी जगह आज एकलव्य का मंदिर है

Nice work. You might use Marathi and English language.