शून्य

उगता हु हर रोज उम्मीद का दामन लेकर

लेकिन

दिन ढलते है ही सिसक जाता हूं

कितने अरमानो को दफ्न कर के 

मैं शून्य हो जाता हूं

रात को सुनता हूं उसीकी आहटे

इसीलिए सो नही पाता हूं

क्यू कहु उसे बुरा भला उसकी याद में

शून्य हो जाता हूं

वो कसमे वो वादे अभी तक याद है मुझे

उनको भुलाने के लिए पी जाता हूं

शिखर हिमालय तक पहुच के फिर

शून्य हो जाता हूं

रंजिशें भुला के उसके

उसीको चाहता हु

उसका वो नूरानी चेहरा

भूलकर भी भूल नही पाता हूं

प्यार के इस अंधेरे में

शून्य हो जाता हूं

पत्थर दिल के सामने सर फोड़ के

शून्य हो जाता हूं

जो हुआ अच्छा हुआ

जो होगा अच्छा होगा

यही कह के

दिन टाल देता हूं

वो अब मेरी नही हो सकती 

ये सोच के फिर से शून्य हो जाता हूं

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