भीड़

एक आदमी जोर जोर से चिल्ला रहा है । कुछ बेच रहा है शायद..!

वो जोर जोर से  चिल्लाकर दुख बेच रहा है ।

वो बोल रहा है के बहुत सस्ते दाम में दे रहा हूँ !

      लेकिन उसे कोई सुन नहीं रहा ।  

अब तो वो मुफ़्त में देने को भी तैयार है पर कोई इस दुख को लेना नहीं चाहता ।

उसके आस पास भी कोई जा नहीं रहा ।

भीड़ में होकर भी वो अकेला है ।

क्योंकि वह दुख बेच रहा है ।

आखिरकार.. ! चिल्लाकर, थक हारकर वो दुख बेचने वाला आदमी अकले कही चला गया ।

बहुत दिन हो गए वो किसी को नहीं दिखा ।

उस दुख बेचने वाले आदमी की चर्चा अब सब लोग कर रहे है ।

सहानुभूति दिखते वक्त उस आदमी ने क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इस पर भी लोग चर्चा कर रहे है । निंदा भी कर रहे है । उम्मीद भी कर रहे है ।

मदद करने का  खोखला विश्वास भी जता  रहा है ।

अजब लोग है ।

और.. और..

एक दिन वो आदमी लौट आया । उसके चेहरे पर मुस्कुराहट है ।

शायद दुख से अकेले लडा होगा ।

उसका चेहरा सुख, समाधान से चहक उठा है ।

आत्मविश्वास और वीरता उसके आवाज से छलक रही है ।

पर ये क्या.. ?
       उसके चारों ओर बहुत भीड़ जाम गई है । इस वजह से उसका चेहरा अब दिख नहीं रहा ।

उसने अब चिल्लाना भी जरूरी नहीं समझा .. !

शायद वो सुख बेच रहा है !!!!!!!  

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