मैं रावण हूँ

मैं रावण हूँ त्रेता का

ज्यादा नहीं बोलूँगा

लेकिन हल्के हल्के धीरे धीरे

तुम्हारे हर पाप खोलूँगा

जो हो गया था गुनाह मुझसे

उसकी सजा अभी तक भुगत रहा हूँ

हरण करके सीता का मैं

भीतर बाहर जल रहा हूँ

तो सोच.. ! तेरे अपराध की सीमा

हद से आगे बढ़ गई है

मद मत्सर की चादर

तुम्हारे आँखों पर चढ़ गई है

मैं केवल दुष्ट  ये भरम तुम्हारा

 मैं इसी समय तोड़ूँगा

हल्के हल्के धीरे धीरे तुम्हारे हर पाप खोलूँगा

 रावण हु लेकिन मुझ में भी काही राम था

शिव शंभू का भक्त मैं उसका सेवक निष्काम था

तुम तो भगवान का नाम लेके

एक दूसरे से लढ़ते हो

एक दूसरे की टांग खिचके

 ऐसे तुम  आगे बढते  हो

तुम्हारा हर एक अपराध मैं

खुद के अपराध से तोलूँगा

हल्के हल्के धीरे तुम्हारे हर पाप खोलूँगा

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