मानो तुम या न मानो मगर
मौसम बदल रहा है
उधर वो दुल्हन बन रही है
और इधर मेरा दिल जल रहा है
बड़े जलील हुये थे उस महफ़िल में हम
जहां हमें शोहरत मिली थी
ये कैसी शायरी है जहाँ
लफ्जों के बजाय खून निकल रहा है
हम गए थे उसकी शादी में उसका
दीदार करने आखरी बार
उसने नजरे चुरा ली ये क्या चल रहा है
वो फूलों से सजी पायदानों से जा रही थी मेरे सामने
और एक मेरा नसीब है जो काँटों पर चल रहा है
मेरी शायरी सुन के अब नहीं खोलता खून उसका
तुम बदल गई हो और जमाना बदल रहा है
वो हस रही थी चलो पीछा छूट गया इससे
खाक हु मैं अब सिर्फ धुवा निकाल रहा है
मालूम है तुम अब किसी और पे मरते हो
मेरे हिस्से का गुलाब कही और खिल रहा है