The real patriotism

आजादी मिलती नहीं उसे कमाना पड़ता है

यह कोई कविता नहीं और ना ही कोई कथा ।  १५ अगस्त तो हो गया बहुत सारे देशभक्ति के स्टैटस भी लगा लिए । अभी हम सच्चे देशभक्त है लेकिन अभी २६ जनवरी आने तक नहीं हम इसके लिए कुछ करेंगे और ना  ही हमे एहसास होगा की हम भारतीय है ।  हमारे देश को आजाद हुए ७५ साल हो गए । मैं तब भी थोड़ा स उलझा था मैं आज भी उलझा हुआ हूं ।

सन १९४८ में

सन १९६२ में

सन १९६५ में

सन १९७१ में

सन १९९९ में

        हर बार मेरे मृत्यु से तुम आबाद रहे हो । मैं ही था भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद  भी ! मातृभूमि के रक्षा के लिए मैं तब भी मर रहा था मैं आज भी मर रहा हूँ ।

 सन १८५७ मे मैंने न जाने कितने घाव सह लिए बस इसी उम्मीद में के तुम आजाद हो जाओ ।  और अब आजादी के ७५ साल बाद भी तुम्हें इस बात का इल्म नहीं है । इसीलिए मैं तब भी उलझा था मैं आज भी उलझा हूँ ।

        मेरा नाम मत पूछो । मेरे कई सारे नाम है । मंगल पांडे, तात्या टोपे, सरदार वल्लभ भाई पटेल या शहिद विक्रम बत्रा, विजय कर्णिक , अब्दुल कलाम। किसी भी स्वतंत्र सेनानी का नाम चुन लो वही मेरा चेहरा है । तुम सोच रहे होंगे १५ अगस्त तो कल था तो आज मुझ में इतनी देशभक्ति क्यू उमड़ रही है । और यही हमारी दिक्कत है ।  हमारा देश प्रेम सिर्फ १५ अगस्त या २६ जनवरी को जगता है । वैसे तो देशभक्ति किसी एक दिन के मोहताज नहीं । बेशक १५ अगस्त १९४७ को हमे आजादी मिली लेकिन क्या सही माईने में इस आजादी के हकदार है ?

       हाँ मैं एक भारतीय हूँ । न जाने कितनी बार तुम्हारी सुरक्षा के लिए मैंने अपनी जान कुर्बान कर दी । जानता हु तुम्हें कदर नहीं है मेरे शहादत की  । जनता हु तुम्हें कीमत नहीं है इस  आजादी की  । लेकिन कोशिश तो मैं पूरी करूंगा तुम्हारे अंदर छिपे हुए इंसानियत को जगाने की । आज अपना देश कई मामलों में आगे बढ़ रहा है । बहुत सारी उपलब्धियां हमने हासिल की है । लेकिन फिर भी कई सारे ऐसे क्षेत्र है जहा पन अभी भी काम करना बाकी है । ओलंपिक में हमने एक गोल्ड मेडल जरूर लिया है और हमको इस बात का अभिमान होन ही चाहिए लेकिन क्या हमे सिर्फ एक मेडल से खुश होना चाहिए ? हम मेडल रैंक पे ४८ वे पायदान पर है । हम स्वच्छता में १६८ नंबर पर है । भ्रष्टाचार में भी हम बहुत आगे है । हमे ये सब बदलना होगा ।   जरूरी नहीं है की तुम सिपाही बन कर या सरहद पर जाके सैनिक की तरह देश की सेवा करो । ऐसे बहुत सारे काम है जो तुम अपने देश के लिए कर सकते हो ।

    अगर तुम घर में गंदगी नहीं चाहते तो रास्तों पे या सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी करने का तुम्हें कोई हक नहीं । यदि तुम इन ठिकानों पर कचरा नहीं डालोगे कही पर नहीं थूकोगे तो अपना हिन्दुस्थान कितना स्वच्छ और साफ सुथरा रहेगा

अगर  तुम  किसी से रीश्वत नही लोगे या चाहे कूछ  भी हो जाये किसी को रीश्वत नही दोगे  तो  सोचो अपने देश में भ्रष्टाचार ही नहीं रहेगा । अगर तुम आपस में वैरभाव न रखकर सिर्फ भाईचारा बढ़ाओगे तो देश में दंगे ही नहीं होंगे । किसी लड़की को बुरी नजर से देखने से पहले अगर उसमे अपनी बहन देखोगे तो बलात्कार नहीं होंगे । अगर कही पर कुछ गलत हो रहा है तो उसे अनदेखा न करके उसकी खिलाफ आवाज उठाओगे तो देश पे क्राइम बहुत काम हो जाएंगे । देश के दुर्गति के लिए अपने राजनेता को मत कोसों अगर वो अपना काम नहीं कर रहा तो  उससे जवाब मांगों संविधान ने तुम्हें पूरा हक दिया है और फिर भी वो न सुधरे तो अगले चुनाव में उससे पैसे न लेकर किसी ओर को मौका दो । अपने न्याय के लिए बेशक लढो लेकिन किसी ओर का हक मत छीनो ।

        मुझे यकीन है अपना देश जरूर बदलेगा शुरुवात खुद से करो । तुम निश्चित अपने इस सोने की चिड़िया वाले देश को फिर से अपना खोया हुआ गतवैभव प्राप्त प्राप्त करके दोगे । तुम कौन हो इस बात से फर्क नहीं पड़ता । डॉक्टर, वकील, किसान, शिक्षक, या किसी निजी कंपनी में नोकरी करते हो अगर तुम अपने देश के प्रति सच्ची निष्ठा रखते हो तप इस देश को फिर से महान बनाने से कोई नहीं रोक सकता । मुझे इसी बात पर एक फिल्म का डायलोग याद आ गया । कोई भी देश परफेक्ट नहीं उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है ।

     चलो तो आज प्रण करते है की इस देश देश को हम विश्व में सबसे अच्छा करके दिखाएंगे ।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

झंडा ऊंचा रहे हमारा

आखिर में थोर सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल जी की कुछ पंक्तियाँ कहना चाहूँगा

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ वतन, करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

[रहबर – Guide
लज्जत – tasteful
नवर्दी – Battle
मौकतल – Place Where Executions Take Place, Place of Killing
मिल्लत – Nation, faith]

   जय हिन्द

वंदे मातरम

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