प्रेम कविता

शाखों से गिरकर कैसे गुलाब निकले !

तेरे लबों से हम लाजवाब निकले !

गुजरे जब तेरी गली से हम

आखों से तेरे क्या सवाल ! क्या जवाब ! निकले

होंठों से होंठ मिले जब कुछ असर तो हुआ

कैसी है ये  बेखुदी जो शराब निकले !

रातों  को सोना मुमकिन नहीं है अब !

झुमके से तेरी क्या आवाज निकले !

झोंक हवा का कुछ कहता है मुझसे

पायल से तेरी अजब सा साज निकले

शाखों से गिरकर कैसे गुलाब निकले !

तेरे लबों से हम लाजवाब निकले !

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